मेरा पता
इस शहर में साल दर साल
डायरी की तरह बदल जाते हैं पते,
हर नया पता जैसे पुराने पते को
अंगूठा दिखा रहा होता है !
सैकडो चिट्ठीयां भटक रही हैं
पुराने पतों पर मेरे नाम की ,
कल की कब्र पर आज के बाजार
वाले फार्मूले से दर लगता है -
कहीं डायरी से कैलेंडर न हो जाऊं !!
# सुशील

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