Prativimb - The Reflection ...

Thursday, December 18, 2008

भूल


भूल

मोम की बुलबुल को

बहेलिये से बचा कर रखा था मैंने

लेकिन यह भूल गया

कि सर्दिया ख़त्म होने वाली है!

आग


आग

जिसके बुझते बुझते

सब कुछ खाक हो गया,

पल दो पल में

सुलग गयी थी वह आग !

मेरा पता

इस शहर में साल दर साल

डायरी की तरह बदल जाते हैं पते,

हर नया पता जैसे पुराने पते को

अंगूठा दिखा रहा होता है !

सैकडो चिट्ठीयां भटक रही हैं

पुराने पतों पर मेरे नाम की ,

कल की कब्र पर आज के बाजार

वाले फार्मूले से दर लगता है -

कहीं डायरी से कैलेंडर न हो जाऊं !!

# सुशील

Express Yourself.....